Tuesday, 29 January 2019

कविता अटल बिहारी वाजपेयी जी

खास बातें अटल बिहारी वाजपेयी ने एक से बढ़कर एक कविताएं लिखीं लोग उनकी कविताओं को खूब पसंद करते हैं उनकी कविताएं लोगों को जीने का तरीका सिखाती हैं नई दिल्‍ली: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) न सिर्फ प्रखर राजनेता और ओजस्‍वी वक्‍ता थे बल्‍कि कलम के जादूगर भी थे. उन्‍होंने एक से बढ़कर एक कई कविताएं लिखीं. भारत रत्‍न अटल बिहारी वाजपेयी इन कविताओं का इस्‍तेमाल अपने भाषणों में भी खूब करते थे. जनता ने जितना प्‍यार और सम्‍मान उन्‍हें बतौर पीएम और नेता के रूप में दिया उतना ही सम्‍मान उनकी कविताओं को भी मिला. उनकी कविताएं महज चंद पंक्तियां नहीं बल्‍कि जीवन का नजरिया हैं, समाज के ताने-बाने के साथ आगे चलने की प्रेरणा हैं और घोर निराशा में भी आशा की किरणें भरने वाली हैं. यहां पर जानिए अटल बिहारी वाजपेयी की ऐसी ही मशहूर 6 कविताएं:  1. उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में, घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में, जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा. कदम मिलाकर चलना होगा. सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ, प्रगति चिरंतन कैसा इति अब, सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ, असफल, सफल समान मनोरथ, सब कुछ देकर कुछ न मांगते, पावस बनकर ढलना होगा. कदम मिलाकर चलना होगा. कुछ कांटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा. क़दम मिलाकर चलना होगा. अटल बिहारी वाजपेयी के इरादों की उड़ान था पोखरण परीक्षण, जानिए अटल जी से जुड़ी 10 बातें 2. हरी हरी दूब पर  ओस की बूंदे  अभी थी,  अभी नहीं हैं|  ऐसी खुशियां  जो हमेशा हमारा साथ दें  कभी नहीं थी,  कहीं नहीं हैं|  क्‍कांयर की कोख से  फूटा बाल सूर्य,  जब पूरब की गोद में  पाँव फैलाने लगा,  तो मेरी बगीची का  पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,  मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूं  या उसके ताप से भाप बनी,  ओस की बूंदों को ढूंढूं?  Atal Bihari Vajpayee Quotes: 'छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता' सूर्य एक सत्य है  जिसे झुठलाया नहीं जा सकता  मगर ओस भी तो एक सच्चाई है  यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है  क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊं?  कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊं?  सूर्य तो फिर भी उगेगा,  धूप तो फिर भी खिलेगी,  लेकिन मेरी बगीची की  हरी-हरी दूब पर,  ओस की बूंद  हर मौसम में नहीं मिलेगी। 3. खून क्यों सफेद हो गया? भेद में अभेद खो गया. बंट गये शहीद, गीत कट गए, कलेजे में कटार दड़ गई. दूध में दरार पड़ गई. खेतों में बारूदी गंध, टूट गये नानक के छंद सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है. वसंत से बहार झड़ गई दूध में दरार पड़ गई. अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं ग़ैर, ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता. बात बनाएं, बिगड़ गई. दूध में दरार पड़ गई.   4. क्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी, राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी। जयप्रकाश जी! रखो भरोसा, टूटे सपनों को जोड़ेंगे। चिताभस्म की चिंगारी से, अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।   5. कौरव कौन कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है| दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है| धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है| हर पंचायत में पांचाली अपमानित है| बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है, कोई राजा बने, रंक को तो रोना है| 6. ठन गई!  मौत से ठन गई!  जूझने का मेरा इरादा न था,  मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,  रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,  यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।  मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,  ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।  मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,  लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?  तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,  सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।  मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,  शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।  बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,  दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।  प्यार इतना परायों से मुझको मिला,  न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।  हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,  आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।  आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,  नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।  पार पाने का क़ायम मगर हौसला,  देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई।  मौत से ठन गई

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